क्या यूनिवर्सल बेसिक इनकम भारत की गरीबी की समस्या का समाधान कर सकती है?
यह क्रांतिकारी विचार समर्थकों के लिए एक रामबाण और आलोचकों के लिए एक महंगा सपना है, लेकिन एक अरब से अधिक लोगों के देश के लिए इसके वास्तविक मायने क्या हैं?

यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) यानी सार्वभौमिक बुनियादी आय, भारत में गरीबी और असमानता से निपटने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण हो सकती है। यह प्रत्येक नागरिक को एक नियमित, बिना शर्त नकद भुगतान प्रदान करके एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा जाल बना सकती है। हालांकि, इसकी भारी वित्तीय लागत, इसे लागू करने की व्यावहारिक चुनौतियां और काम करने की इच्छा पर इसके संभावित प्रभाव इसे एक बेहद जटिल और विवादास्पद नीतिगत विकल्प बनाते हैं। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में इस पर विस्तार से चर्चा की गई थी, जिसने इसे अकादमिक बहसों से निकालकर मुख्यधारा की नीतिगत चर्चा के केंद्र में ला दिया।
यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) वास्तव में क्या है?
यूनिवर्सल बेसिक इनकम एक सामाजिक सुरक्षा मॉडल है जिसमें सरकार देश के सभी नागरिकों को नियमित अंतराल पर एक निश्चित धनराशि का भुगतान करती है। यह भुगतान बिना किसी शर्त के होता है, यानी इसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपनी रोजगार की स्थिति, आय का स्तर या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि साबित करने की आवश्यकता नहीं होती है। यूबीआई का विचार तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित है: यह सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) है, बुनियादी (बेसिक) जरूरतों को पूरा करने के लिए है, और यह आय (इनकम) के रूप में सीधे नकद में दी जाती है।
यह भारत की मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं से मौलिक रूप से अलग है। उदाहरण के लिए, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) काम करने पर आधारित है, जबकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) लक्षित समूहों को सब्सिडी वाले सामान (अनाज) प्रदान करती है, न कि नकद। इसके विपरीत, यूबीआई व्यक्तियों को सीधे वित्तीय स्वतंत्रता देता है, जिससे वे अपनी जरूरतों के अनुसार खर्च करने का निर्णय ले सकते हैं। इसका दार्शनिक आधार थॉमस पेन जैसे विचारकों के लेखन में मिलता है, जिन्होंने तर्क दिया कि प्रत्येक नागरिक को समाज के सामूहिक धन में एक हिस्सा पाने का अधिकार है।
भारत में यूबीआई के सबसे बड़े समर्थक और आलोचक कौन हैं?
भारत में यूबीआई के समर्थकों में लंदन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. गाय स्टैंडिंग और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन जैसे प्रमुख अर्थशास्त्री शामिल हैं। वे इसे गरीबी, असमानता और अनिश्चितता से निपटने के लिए एक क्रांतिकारी कदम मानते हैं। दूसरी ओर, कई अन्य अर्थशास्त्री और नीति निर्माता इसकी वित्तीय व्यवहार्यता और श्रम बाजार पर पड़ने वाले संभावित नकारात्मक प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त करते हैं।
समर्थकों का तर्क है कि यूबीआई वर्तमान में चल रही सैकड़ों जटिल और अक्षम सब्सिडी योजनाओं को सरल बना सकता है, जिससे प्रशासनिक लागत कम होगी और भ्रष्टाचार घटेगा। उनका मानना है कि यह सीधे व्यक्तियों, विशेषकर महिलाओं के हाथों में पैसा देकर उन्हें सशक्त बनाता है, जिससे बेहतर स्वास्थ्य, पोषण और बच्चों की शिक्षा जैसे सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। मध्य प्रदेश में सेवा (SEWA) और यूनिसेफ (UNICEF) द्वारा किए गए एक पायलट प्रोजेक्ट ने दिखाया कि नकद हस्तांतरण से गांवों में खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
इसके विपरीत, आलोचकों का सबसे बड़ा तर्क इसकी विशाल वित्तीय लागत है। एक अनुमान के अनुसार, एक सार्थक यूबीआई लागू करने पर भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5% तक खर्च हो सकता है। उन्हें यह भी डर है कि बिना किसी शर्त के पैसा मिलने से लोग काम करना बंद कर सकते हैं और इससे मुद्रास्फीति भी बढ़ सकती है। इसके अलावा, यूबीआई को वित्तपोषित करने के लिए मौजूदा खाद्य, उर्वरक और ईंधन सब्सिडी को खत्म करना एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती होगी, क्योंकि इन सब्सिडी के लाभार्थी इसका पुरजोर विरोध कर सकते हैं।
“यूबीआई गरीबी पर एक सीधा हमला है। यह नौकरशाही की परतों को हटाता है और सम्मान के साथ व्यक्ति के हाथ में क्रय शक्ति देता है, जिससे वे अपनी प्राथमिकताओं को स्वयं निर्धारित कर सकते हैं।”
क्या भारत यूबीआई का खर्च उठा सकता है?
भारत में यूबीआई की राह में सबसे बड़ा रोड़ा इसकी वित्तीय लागत है। इसका खर्च कितना होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि राशि कितनी है और कितने लोगों को कवर किया जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में यह अनुमान लगाया गया था कि 75% आबादी को ₹7,620 प्रति वर्ष की यूबीआई देने से देश की जीडीपी पर लगभग 4.9% का बोझ पड़ेगा। यह एक बहुत बड़ी रकम है, जो भारत के रक्षा बजट से भी अधिक है।
इस खर्च को उठाने का एकमात्र व्यावहारिक तरीका मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था में बड़े पैमाने पर सुधार करना है। सरकार हर साल भोजन, उर्वरक, पेट्रोलियम और अन्य कई चीजों पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करती है। सिद्धांत रूप में, इन सभी सब्सिडी को समाप्त करके उस पैसे का उपयोग यूबीआई को वित्तपोषित करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन व्यवहार में, यह बेहद मुश्किल है। किसानों को उर्वरक सब्सिडी या गरीबों को खाद्य सब्सिडी खत्म करने के गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। इसलिए, जब तक इस पर एक व्यापक राजनीतिक सहमति नहीं बनती, तब तक राष्ट्रव्यापी यूबीआई एक दूर का सपना ही लगता है।
| योजना / सब्सिडी | अनुमानित व्यय (करोड़ रुपये में) | जीडीपी का अनुमानित प्रतिशत |
|---|---|---|
| प्रस्तावित यूबीआई (75% आबादी) | ~10,00,000 | ~4.5% |
| खाद्य सब्सिडी (पीडीएस) | 1,97,330 | ~0.7% |
| उर्वरक सब्सिडी | 1,75,100 | ~0.6% |
| मनरेगा (MGNREGA) | 60,000 | ~0.2% |
| प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) | 60,000 | ~0.2% |

यूबीआई से काम करने की इच्छा पर क्या असर पड़ सकता है?
आलोचकों द्वारा उठाई गई यह एक प्रमुख चिंता है कि मुफ्त पैसा लोगों को आलसी बना देगा और वे काम करना छोड़ देंगे। इस 'आलस्य जाल' (leisure trap) के सिद्धांत के अनुसार, यदि लोगों को बिना काम किए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसा मिलता है, तो वे रोजगार की तलाश नहीं करेंगे, जिससे श्रम आपूर्ति में कमी आएगी और अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।
हालांकि, दुनिया भर में हुए अधिकांश पायलट अध्ययनों से मिले सबूत इस डर का समर्थन नहीं करते हैं। केन्या, फिनलैंड और कनाडा में हुए प्रयोगों के साथ-साथ भारत के मध्य प्रदेश पायलट में भी यह पाया गया कि यूबीआई का रोजगार पर बहुत कम या कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। प्रस्तावित यूबीआई राशि आमतौर पर केवल जीवित रहने के लिए पर्याप्त होती है, न कि एक आरामदायक जीवन जीने के लिए। लोग अभी भी अपने जीवन स्तर को बेहतर बनाने, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने और भविष्य के लिए बचत करने की इच्छा रखते हैं। वास्तव में, यूबीआई एक छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए बीज पूंजी प्रदान करके या लोगों को बेहतर नौकरी खोजने के लिए समय देकर रोजगार को *सक्षम* कर सकता है।
मध्यप्रदेश यूबीआई पायलट प्रोजेक्ट के प्रमुख परिणाम
यूबीआई और मौजूदा सरकारी योजनाओं में क्या अंतर है?
यूबीआई और भारत की मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं के बीच सबसे बुनियादी अंतर 'शर्तों' का है। यूबीआई बिना शर्त (unconditional) और सार्वभौमिक (universal) है, जो सभी को नकद के रूप में दिया जाता है। इसके विपरीत, अधिकांश भारतीय योजनाएं सशर्त और लक्षित (targeted) हैं। उदाहरण के लिए, मनरेगा में भुगतान 100 दिन का अकुशल श्रम करने की शर्त पर मिलता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सब्सिडी वाला अनाज केवल गरीबी रेखा से नीचे के लक्षित परिवारों को मिलता है।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) जैसी योजनाएं यूबीआई के करीब हैं क्योंकि वे नकद हस्तांतरण करती हैं, लेकिन वे भी लक्षित हैं - केवल कुछ मानदंडों को पूरा करने वाले किसान परिवारों के लिए। यूबीआई इन सभी जटिल, लक्षित योजनाओं के जाल को हटाकर एक सरल, पारदर्शी प्रणाली बनाने का वादा करता है। इसका उद्देश्य लाभार्थियों को 'चुनने' की प्रक्रिया में होने वाले भ्रष्टाचार और अपात्रों को बाहर रखने की त्रुटियों (exclusion errors) को खत्म करना है और सीधे नागरिक को सशक्त बनाना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यूबीआई का पैसा कहाँ से आएगा?
यूबीआई को वित्तपोषित करने के लिए सरकार को मौजूदा सब्सिडी, विशेष रूप से भोजन, उर्वरक और ईंधन सब्सिडी को खत्म करने या कम करने पर विचार करना पड़ सकता है। अन्य स्रोतों में कर राजस्व बढ़ाना या कुछ प्रमुख कर छूटों को समाप्त करना शामिल हो सकता है ताकि वित्तीय बोझ को संतुलित किया जा सके।
क्या यूबीआई से महंगाई बढ़ेगी?
यह एक वैध चिंता है। यदि उत्पादन में समान वृद्धि के बिना बहुत से लोगों के हाथों में अचानक अतिरिक्त नकदी आ जाती है, तो मांग बढ़ने से मुद्रास्फीति हो सकती है। हालांकि, समर्थकों का तर्क है कि यदि यूबीआई को अन्य सब्सिडी की जगह लाया जाता है, तो समग्र वित्तीय प्रभाव तटस्थ हो सकता है, जिससे मुद्रास्फीति का जोखिम कम हो जाएगा।
क्या यूबीआई गरीबी को पूरी तरह से खत्म कर देगा?
पूरी तरह से नहीं। यूबीआई अत्यधिक गरीबी को कम करने और एक बुनियादी सुरक्षा जाल प्रदान करने में मदद कर सकता है, लेकिन यह गरीबी के सभी आयामों जैसे कि शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच और सामाजिक भेदभाव का समाधान नहीं करता है। यह एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन संपूर्ण समाधान नहीं।
यूबीआई पाने के लिए कौन पात्र होगा?
इसके 'यूनिवर्सल' यानी सार्वभौमिक सिद्धांत के अनुसार, देश का प्रत्येक नागरिक यूबीआई प्राप्त करने का पात्र होगा। हालांकि, भारत जैसे देश की विशाल आबादी और वित्तीय बाधाओं को देखते हुए, कुछ प्रस्ताव 'अर्ध-सार्वभौमिक' मॉडल का सुझाव देते हैं। इसमें लागत कम करने के लिए शायद सबसे अमीर 25% आबादी को इस योजना से बाहर रखा जा सकता है।
क्या भारत में यूबीआई का कोई सफल उदाहरण है?
भारत में कोई राष्ट्रव्यापी यूबीआई लागू नहीं किया गया है। लेकिन, मध्य प्रदेश में 2011-12 में यूनिसेफ (UNICEF) और सेवा (SEWA) द्वारा एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया था, जिसने बेहतर पोषण, स्वास्थ्य और स्कूल में उपस्थिति जैसे कई सकारात्मक परिणाम दिखाए थे। इसके अलावा, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट पार्टी ने राज्य में यूबीआई लागू करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो पाया।
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